ऐतिहासिक गौरव

मोकलसर गांव और श्री मोकल मामा जी का इतिहास

प्राचीन विरासत

मोकलसर एक बहुत प्राचीन गांव है जहां आज भी एक ऐतिहासिक धरोहर 'पग बावड़ी' स्थित है। चौदहवीं शताब्दी में यहां दहिया राजपूतों का शासन था। पन्द्रहवीं शताब्दी में सिवाना किले के राव जैतमाल जी के पौत्र मोकल नाम के प्रतापी शासक हुए, जिन्होंने विक्रम संवत 1535 को मोकलसर पर विजय प्राप्त की और अपने नाम से गांव का नाम 'मोकलसर' दिया।

मोकल जी ने 11 वर्ष तक यहां न्यायप्रिय शासन किया। उनके पश्चात उनके पुत्र रावत बीदा मोकलसर की गद्दी पर बैठे। रावत बीदा जी ने मेवाड़ महाराणा सांगा की रक्षार्थ सेवन्त्री गांव के रुपनारायण मन्दिर में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। उनके इस अभूतपूर्व बलिदान के कारण ही आज भी उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

विक्रम संवत 1678 में बालावत राठौड़ मोकलसर आए और तब से यह गांव बालावत राठौड़ों की जागीर रहा है। आज यह धाम समस्त भक्तों के लिए सुरक्षा, श्रद्धा और शक्ति का प्रतीक है।

Shree Mokal मामा जी भोपाजी

पावन परंपराएं

श्रद्धा, विश्वास और अटूट भक्ति

मिट्टी के घोड़े

श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर मामा जी को सुंदर और रंगीन मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं।

रक्षक देवता

मामा जी को गांव, पशुधन और भक्तों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। उनकी कृपा हर विपदा को हर लेती है।

पवित्र पदयात्रा

अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं पर स्थित इस धाम की यात्रा भक्त बड़े हर्षोल्लास के साथ करते हैं।

राठौड़ सींहा जैतमालोत मोकलसर

सींगा जी राठौड़ गढ़ सिवाना के राव जैतमाल राठौड़ के वशंधर रावत मोकल (मोकलसर) के तीसरे पूत्र थे।

उदयभाण चांपावत री ख्यात में सींघा तथा केलवा री ख्यात में सींगा लिखा हुआ मिलता है परन्तु जैतमालोत् राठौड़ो के इतिहास में इनका नाम सांधो मिलता है और मेवाड़ के इतिहास में सींहा लिखा गया है।

राव बही में सींगा लिखा हुआ है अतः राव बही को आधार मानते हुए सींगा ही सही है जिससे हिंदी में सींहा लिखा जा सकता है।

मोकल जी की मृत्यु के पश्चात उनके पाटवी पूत्र रावत बीदा मोकलसर के उत्तराधिकारी हुए। सींगो जी मेड़ता के राव वीरमदेव के यहां रहे और वि.स.१५९५ में मालदेव की सेना के विरुद्ध सघंर्षरत रहे तथा युद्ध में घायल भी हुए। मेड़ता राज्य की सेवा के बदले वीरमदेव ने उन्हें लीलिया,वगड़, बड़गांव,वरणावो और मेहरासी गांव जागीर में दिए।

बड़े भाई रावत बीदा के राणा सांगा की रक्षार्थ सेवन्त्री गांव के रुपनारायण मन्दिर में प्राणोत्सर्ग के कारण मोकलसर का राज्य जैतमालोत् राठौड़ो के आधिपत्य से निकल गया। राणा सांगा ने महाराणा बनते ही सींगो जैतमालोत् को मेड़ता से बुलाकर बदनोर की जागीर प्रदान की। सींगो जी वीर योद्धा के साथ-साथ एक सिद्ध पुरुष भी थे।

कुछ इतिहासकारों ने सींहा जी का अपने बड़े भाई बीदा जी के साथ सेवन्त्री गांव में सांगा की रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त होना लिखा है और जब सांगा मेवाड़ के महाराणा बने तब बीदा जी और उनके भाईयो के बलिदान का स्मरण रखते हुए उनके उत्तराधिकारी की खोज का हुकम दिया परन्तु वास्तविक उत्तराधिकारी का तो पता नही चला परन्तु सींगा जी के पूत्र पंचाईण जी का पता लगने पर उन्हें बदनोर की जागीर देना लिखा है जो तर्क संगत हो सकता है।

परन्तु उदयभाण चांपावत के अनुसार बदनोर की जागीर सींगा जी को दी गई थी।

राठौड़ सींहा जैतमालोत वंशावली

राव जैतमाल राठौड़

(गढ़ सिवाना नरेश)

रावत वेजल

(खाटू नागोर)

रावत कान्हड़देव

(फलोदी ठिकाना)

रावत उदा

(गगंराणा ठिकाना)

रावत मोकल (मोकलसर ठिकाने के संस्थापक)

रावत मोकल जी के वशंजो के आधिपत्य में मोकलसर के पश्चात बदनोर,बेमाली,वणौल, देसूरी, जोजावर,और अन्तत: केलवा व आगरिया ठिकाने रहे।

  • उदयभाण चापांवत के अनुसार इनके निम्न पूत्र हुए - भदा, मेहरा व सींगो
  • केलवा तवारीख के अनुसार बीदा, भदा, सीगों, लखमणसी और करमसी नाम के पूत्र हुए।

रावत बीदा (मोकलसर)

--- ठाकुर नेतसी मेवाड़ महाराणा रतनसिंह ने इन्हें बेमाली की जागीर प्रदान की तत्पश्चात वणोल ठिकाना, मेवाड़ व ठाकुर किशनदास के समय देसूरी ठिकाना और फिर केलवा व आगरिया ठिकाना तथा बोराट व गोड़वाड़ में २७ गांव ओर प्रदान किए गए।

भदा (लाम्बिया ठिकाना - मेड़ता)

इनके तीन पूत्र हुए:

  • अखेराज - मेड़ता के लांबिया, पालड़ी, नेलड़ी धोलेराव, आखुवास, मुगदड़ा बड़ो आदि ठिकाने मिले। इनके नौ पूत्र हुए: मांडण, विसलदेव, वेरा, अचला, पांथौ, हिंगोलदास, भाणीदास, गोपालदास।
  • हमीर
  • ससांरचन्द्र

अखेराज जी के वशंज गोडवाड़ के मोखमपुरा (रानी), वीरमपुरा माताजी (नाडोल), डायलाना खुर्द (बागोल) आदि गांवो में है।

सींगो / ठाकुर सींगा (बदनोर ठिकाना)

इन्हें महाराणा द्वारा बदनोर की जागीर प्रदान की गई। इनके पाँच पूत्र हुए:

१. पंचाइण: (बदनोर ठिकाना) इनके तीन पूत्र हुए - जेता, लूंणा, जसवंत।

२. रणधीर जी: इनके पूत्र - परबतसिंह जी, मानसिंह जी, महेशदास जी।

३. बाखल जी

४. मेहकरण जी: मेवाड़ राज्य की सेवा में रहे। इनके ३ पूत्र हुए - सूजा जी, सूरा जी और सांकर जी

(सूजा जी वि.स.१६५५ में सोजत में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके ५ पूत्र हुए - सुंदरदास जी, रामदास जी, हरिदास जी, पूर्णमल जी, सांवंलदास)

५. जोगा: इनके तीन पूत्र हुए - जसवंत, प्रतापसी, सहसमल।

मेहरा

ये मेड़ता राज्य की सेवा में रहे तथा इनके पूत्र अरड़कमल को मेड़ता का डिगराणा गांव जागीर में मिला।

रावत बीदा मोकलोत के बलिदान के कारण राणा सांगा अपने भाईयों के प्रतिघात से बचे आगे चलकर इन्ही के वंश में महाराणा प्रताप जैसे परतापी शासक हुए। बीदा के अभूतपूर्व बलिदान से प्रभावित होकर ही महाराणा ने जैतमालोत् राठौड़ो को बड़ी जागीर प्रदान की फलस्वरूप जैतमालोत् राठौड़ो को मेवाड़ में रहने का अवसर मिला।

मेवाड़ राज्य पर बाहरी आक्रांताओं के आक्रमण के समय खानवा के युद्ध में वीरमदेव मेड़तिया के साथ,चित्तोड़ के तीसरे शाके व हल्दीघाटी के युद्ध में क्षत्रुओ से वीरतापूर्वक लड़े व वीरगति को प्राप्त हुए।

राठौड़ जयमल से मेड़ता निकल जाने के पश्चात जैतमालोत राठौड़ जो मेड़ता के प्रमुख उमराव थे जयमल जी के साथ ही मेवाड़ आ गए और यहां पर भी अनेक युद्धो में अपनी वीरता का परिचय दिया।

वंशक्रम एवं साक्ष्य

बिराई की राव बही, उदयभाण चांपावत री ख्यात और केलवा तवारीख के आधार पर संकलित।

चित्तौड़ के तीसरे शाके में मोकल जी जैतमालोत् राठौड़ो व वीरमदेव मेड़तिया राठौड़ो के वशंजो नेतसी जैतमालोत्, जयमल मेड़तिया व कल्ला महेचा सहित लगभग १५० योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।

आजादी तक केलवा व आगरिया ठिकाने (मोकल जी के वशंजो) जैतमालोत् राठौड़ो के आधिपत्य में रहे।

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